गीता का पहला अध्याय का प्रथम श्लोक





भगवत गीता का पहला अध्याय है अर्जुनविषादयोग यहां शुरुआत होती है धृतराष्ट्र के सवालों से वो जानना चाहते हैं कि युद्ध में क्या हो रहा है उनका पुत्र दुर्योधन और उनकी सेना क्या कर रही है और साथ ही में पांडा पुत्रों की सेना क्या कर रही है उसके बाद दोनों सेनाओं के शूरवीराओं का वर्णन और उसके बाद आता है । अर्जुन का विषाद मतलब कि उनका दुख उनकी समस्या उनका धर्म सकट आये सुनते है। अर्जुनविषादयोग | गीता का पहला अध्याय





धूतराष्ट्र उवाच





धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव: ।





मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥1-1॥





भावार्थ :धूतराष्ट्र संजय से पूछते हैं धर्मभुमि कुरुक्षेत्रे में युध करने के लिए एकत्र हुये मेरे और पांडा पुत्र क्या कर रहे हैं। धूतराष्ट्र जानना चाहते हैं कि यूध स्थल पर आखिर हो किया रहा हैं। धूतराष्ट्र अंधे थे। देख नहीं सकते थे। लेकिन ऑखो से अंधे थे। मन और मस्तिक्स से नहीं उन्हें पता था। कि वो धर्म के साथ नहीं हैं। क्यो कि धर्म तो वाह होता हैं जहॉ श्री कृष्ण थे। अपने पुत्र मोहो में उन्होंने शंती कि जगह युध को चुन्हा था। लेकिन वो जानते थे। कि इस युध को जितना आसान नहीं होगा। अपने जिवन में जब हम कुछ गलत करते हैं। तो हम भी समझ रहे होते है। कि हमारे किये का नतीजा सायद अछा ना हो। और एसा ही धूतराष्ट्र के साथ हो रहा था। वो भी इसी डर , इसी आसखॉ में दिखते हैं। | गीता का पहला अध्याय


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